Thursday, April 16, 2026
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सर्दियों के मौसम में मत्स्य तालाब का रख-रखाव एवं रोग प्रबंधन पर विशेषज्ञों की सलाह

मझौलिया से बब्लु कुमार पटेल की रिपोर्ट

मझौलिया प्रखंड अंतर्गत मत्स्य पालन करने वाले किसानों के लिए सर्दियों का मौसम अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। मछली एक जलीय जीव है, इसलिए उसके जीवन पर तालाब के पर्यावरण का सीधा प्रभाव पड़ता है। सर्दियों में तापमान कम होने के कारण मछलियां अधिकतर तालाब की तली में समय बिताती हैं, जिससे उनकी गतिविधियां कम हो जाती हैं। यदि इस मौसम में तालाब और मछलियों की समुचित देखरेख नहीं की जाए, तो उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।माधोपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र, पश्चिमी चंपारण के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह तथा विषय वस्तु विशेषज्ञ (मत्स्य) डॉ. जग पाल ने बताया कि सर्दियों में कोहरा और बादल छाए रहने से तालाबों को पर्याप्त सूर्य प्रकाश नहीं मिल पाता। इससे जलीय पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है और तालाब में घुलित ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। तालाब में ऑक्सीजन की मात्रा 5 पीपीएम होना आवश्यक है। यदि मछलियां पानी की सतह पर आकर मुंह निकालने लगें, तो यह ऑक्सीजन की कमी का संकेत है।
ऐसी स्थिति में पानी को डंडे से पीटकर या मानव श्रम द्वारा उथल-पुथल करने से वातावरण की ऑक्सीजन पानी में घुल जाती है। ताजे पानी को फव्वारे के रूप में तालाब में डालना भी लाभकारी होता है। यदि एरेटर की सुविधा उपलब्ध हो, तो प्रतिदिन 1–2 घंटे इसका उपयोग करना चाहिए।
विशेषज्ञों ने बताया कि सर्दियों में तालाब में पानी की गहराई 7 से 8 फीट बनाए रखना चाहिए। ठंड से बचाव के लिए प्रतिदिन बोरिंग का ताजा पानी तालाब में डालना उपयोगी होता है। साथ ही 15–20 दिनों के अंतराल पर तालाब का लगभग एक चौथाई पानी निकालकर ताजा पानी भरना चाहिए। मछलियों को इस मौसम में सामान्य से कम आहार देना चाहिए। प्रति किलोग्राम मछली पर लगभग 20 ग्राम भोजन पर्याप्त होता है। पानी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए 15 दिनों के अंतराल पर चूने का प्रयोग करना चाहिए।
सर्दियों में मछलियों में होने वाले प्रमुख रोग सर्दियों में मछलियों में रोगों की संभावना बढ़ जाती है। आरगुलेसिस रोग में मछलियों के शरीर पर लाल धब्बे दिखाई देते हैं और मछलियां तालाब के किनारे शरीर रगड़ती हैं। इसके उपचार हेतु विशेषज्ञ की सलाह से 35 एमएल साइपरमेथ्रिन को 100 लीटर पानी में घोलकर 1 हेक्टेयर तालाब में 5–5 दिन के अंतराल पर तीन बार प्रयोग किया जा सकता है।

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